ओ मिट्टी के अधिनायक

.ओ मिट्टी के अधिनायक, क्या तेरी कला का बखान करूं
जितना भी करूं, कम लगता है ,केसे तेरा गुणगान करूं ?
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संकेत मिले तेरी रचना के, तूं सबसे पहले जग में आया
चक्र, स्वास्तिक, ईंट, कलश, सब तूने ही पुजवाया
तेरे घट शीतल नीर भरा ,तभी तो घट घट राम रमा
यंत्र यान प्राणी फेरे फिरते है, तूं थमा तो सब थमा
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ओ मिट्टी के अधिनायक, क्या तेरी कला का बखान करूं,
जितना भी करूं, कम लगता है ,केसे तेरा गुणगान करूं ?
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खनन-चूरण-मिश्रण-आकार-विस्तार, तूं ही जान पाया
छोटा, बड़ा, वृत, शंकु, तूने गणित का पादप लगाया
घर्षण, घूर्णन, केंद्र, बल, गति, तूने जग को बतलाया
गुरुत्वाकर्षण-उत्प्लावन बल का ज्ञान कहाँ से तू लाया
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ओ मिट्टी के अधिनायक, क्या तेरी कला का बखान करूं
जितना भी करूं, कम लगता है ,केसे तेरा गुणगान करूं ?
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घरती की धुल पर तूने अक्ष और नक्श बनाया
पञ्च तत्व संगम कर, प्राण प्रतीक सा दीप जलाया
सिन्धु-इंका-रोम-मिश्र-यूनान-आर्यों को तूने सभ्य बनाया
जन्म, परण, मरण, निर्माण, तेरे बिन पूरण हो नहीं पाया
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करके कर्म ब्रम्हा का, तूने पद प्रजापति सर्वोच्च पाया
मेरा अकूत जोश भी, तेरी गोरव गाथा लिख नहीं पाया
वेद, विज्ञानं, इतिहास, आध्यात्म, होते है तुझ से प्रारंभ
लिखे तेरी महिमा ,मेरी नादान कलम में कहा इतना दम्भ ?
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ओ मिट्टी के अधिनायक, क्या तेरी कला का बखान करूं
जितना भी करूं कम लगता है ,केसे तेरा गुणगान करूं ?

......प्रजापति शेष

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